कार्बन की कीमत का निर्धारण ही भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों को पाने की मूल रणनीति होगी

भारत में नेशनल कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को बनाने का प्रस्ताव बहुत अच्छी पहल है। कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम यह सुनिश्चित करती है कि कार्बन उत्सर्जन उस लक्षित स्तर तक सीमित रहे जिसे समाज और सरकार जरूरी समझते हैं।

Jagran
post by Priti Singh | 6:30pm on 10th Aug 2022 Wednesday
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ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में संशोधन के लिए विधेयक लोकसभा से पारित हो गया है। इसका उद्देश्य भारत के लिए एक कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को तैयार करना है। इसे कार्बन इमीशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) भी कहते हैं। निश्चित तौर पर यह भारत की जलवायु नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस संशोधन विधेयक के विभिन्न प्रभावों को समझने के लिए ईटीएस के कुछ प्रमुख बिंदुओं को जानना जरूरी है। सबसे पहले कार्बन की कीमत निर्धारण के विचार पर आते हैं। अगर यह कहें कि जीवाश्म ईंधन (कोयला, डीजल इत्यादि) के इस्तेमाल से पांच टन कार्बन उत्सर्जन होता है और कार्बन की कीमत 100 रुपये प्रति टन है तो इस जीवाश्म ईंधन के उपयोगकर्ता को 500 रुपये की अतिरिक्त लागत का भुगतान करना पड़ेगा। इस तरह से कार्बन की कीमत तय करने से जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल खर्चीला हो जाता है, जो अंत में इसके उपयोग को हतोत्साहित करता है।